पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, अनिवार्य कानून से महिलाओं के रोजगार पर पड़ सकता है असर

पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, अनिवार्य कानून से महिलाओं के रोजगार पर पड़ सकता है असर

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए पेड मेंस्ट्रुअल लीव (मासिक धर्म अवकाश) अनिवार्य करने की मांग से जुड़ी याचिका का निस्तारण करते हुए केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर नीति बनाने पर विचार करने को कहा है। अदालत ने निर्देश दिया कि सरकार इस विषय पर सभी हितधारकों से परामर्श कर उचित फैसला ले।

रोजगार पर असर की चिंता

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि मासिक धर्म अवकाश को कानून बनाकर अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं के रोजगार पर उल्टा असर पड़ सकता है। अदालत के अनुसार ऐसी स्थिति में कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं, जिससे कार्यबल में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी नीति को लागू करते समय उसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर भी ध्यान देना जरूरी है, ताकि महिलाओं के अवसरों पर नकारात्मक असर न पड़े।

याचिकाकर्ता की लोकस स्टैंडी पर सवाल

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता शैलेन्द्र मणी त्रिपाठी की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने के अधिकार) पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर अब तक कोई महिला स्वयं अदालत के सामने नहीं आई है।

अदालत ने यह भी बताया कि यह इसी विषय पर याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई तीसरी याचिका है। इससे पहले फरवरी 2023 में दायर पहली याचिका का निस्तारण करते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की अनुमति दी थी।

इसके बाद 2024 में याचिकाकर्ता ने फिर अदालत का रुख किया और कहा कि मंत्रालय ने उसके प्रतिनिधित्व पर कोई जवाब नहीं दिया है। उस याचिका का जुलाई 2024 में निस्तारण करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर नीति संबंधी निर्णय लेने पर विचार करने को कहा था।

याचिका में क्या मांग की गई थी

वर्तमान याचिका में केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए उचित राहत देने के लिए कानून या नीतियां बनाएं।

याचिका में कहा गया था कि कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान डिसमेनोरिया, एंडोमेट्रियोसिस, यूटेराइन फाइब्रॉइड्स, एडेनोमायोसिस और पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके लिए सामान्य रूप से काम करना मुश्किल हो सकता है। साथ ही कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था करने की भी मांग की गई थी।

कर्नाटक का उदाहरण भी आया सामने

सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट एम.आर. शमशाद ने अदालत को बताया कि फिलहाल केवल कर्नाटक सरकार ने मासिक धर्म अवकाश से संबंधित नीति बनाई है। इस पर कोर्ट ने कहा कि स्वेच्छा से ऐसी सुविधा देना अच्छी बात है, लेकिन यदि इसे कानून के जरिए अनिवार्य कर दिया गया तो इससे महिलाओं के करियर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

चीफ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि हर महीने छुट्टी का कानूनी अधिकार बना दिया गया तो निजी क्षेत्र में नियोक्ता महिलाओं को जिम्मेदार पद देने से भी हिचक सकते हैं। इससे कार्यस्थलों पर महिलाओं को लेकर गलत धारणा बनने का खतरा भी हो सकता है।

केंद्र सरकार को नीति पर विचार करने का निर्देश

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के प्रतिनिधित्व पर विचार करे और सभी हितधारकों से परामर्श करके इस विषय पर उपयुक्त नीति बनाने की संभावना पर निर्णय ले।